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क़िस्सा-ए-उमराव जान

जब के ज़िंदगी तक़रीबन आधी से ज़्यादा गुज़र चुकी है, उम्र के इस पड़ाव पे मैं संजीदा हो गया हूँ। वैसे गुज़री ज़िंदगी भी कम संजीदा नहीं रही, बस अब हक़ीक़त से दो चार हो कर जो तजरबात हासिल कर लिए है वो ज़िंदगी को तरतीब में बनाए रखते हैं। ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म से कम नहीं। सुलझाते सुलझाते कब ये उम्र शाम को जा पहुँचती है मालूम ही नहीं पड़ता।


शराबख़ाने में आए थे हँसते खेलते फ़िराक़

जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए


खैर आज आप को एक पुराना क़िस्सा बयान करता हूँ। ये क़िस्सा है तवायफ़ उमराव जान 'अदा' का। वो लखनऊ की मशहूर तवायफ़ थीं। गाने, नाचने में बड़ी माहिर थीं मगर उस से भी बढ़ कर एक मुकम्मल शायरा थीं। उन दिनों उनके कलाम उस दौर के रिसालों में छपा करते थे। बात अठारहवीं सदी के अाखिर और उन्नीसवीं सदी के शुरू के दौर की है। उन के एक आश्ना थे मिर्ज़ा हादी अली 'रूसवा'। उन्हीं को एक बार उन्होंने जो अपना किस्सा तफ़सील से बयान किया था। मिरज़ा ने वो क़िस्सा नाविल की शक्ल में शाया करवाया। उमराव जान कोई लेखक की कल्पना नहीं हैं बल्कि एक जीता जागता असल ज़िंदगी का एक किरदार हैं जो उस दौर में ज़िंदा थीं। खुद उमराव जान की ज़बां में;


किसको सुनाएँ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार ऐ 'अदा'

आवारगी में हम ने ज़माने की सैर की


उमराव जान का असल नाम अमीरन था। उनकी पैदाइश फ़ैज़ाबाद के एक मामूली परिवार में हुई। एक बदमाश दिलावर ख़ान के ख़िलाफ़ उस के बाप ने गवाही दी थी। उसी ने रिहा होने के बाद बदला लेने के तौर पे अमीरन को अगवा कर लिया और उसे लखनऊ की मशहूर तवायफ़ ख़ानम जान के हाथ डेढ़ सौ रूपये में बेच दिया। ख़ानम ने अमीरन का नाम बदल कर उमराव रख दिया।


लुत्फ़ है कौन सी कहानी में

आप-बीती कहूँ या जग-बीती


कच्ची उम्र की उस लड़की पे तो क्या बीती, सब जानते हैं। मगर उस के माँ बाप पे क्या गुज़री ये सोच के दिल भर आता है। तवायफ़ बनना उसकी ख़ुशी न थी, मजबूरी थी। इस सब के बावजूद उन्होंने न सिर्फ़ मौसीक़ी बल्कि उर्दू और फ़ारसी की भी मुकम्मल तालीम हासिल की। अलिफ़, बे के बाद उसने फ़ारसी की तमाम वो शुरूआती किताबें, करीमा, मामकीमा, महमूदनामा, सर्फरवां वग़ैरह पढ़ीं। इसी की बदौलत उसने अमीरों, रईसों की महफ़िलों में जगह पाई। शाही दरबारों में जाने का हौसला पाया।


न पूछो नामा-ए-माल की दिल-आवेज़ी

तमाम उम्र का क़िस्सा लिखा हुआ पाया


खैर क़िस्सा यूँ मुख़्तसर पाया जाए के उमराव की जवानी में ही दिलावर खां पकड़ा गया और वो भी जब एक बार गोमती किनारे सैर के रोज़ उमराव ने उसे देख लिया और निशान देही पे थानेदार ने मल्कागंज से रात तीन बजे गिरफ़्तार कर लिया। दो महीने बाद उसे फाँसी की सज़ा हुई। और यूँ दिलावर खां जहन्नुम को रवाना हुआ।

हम भी हैं मुख़तार लेकिन इस क़दर है अख़्तियार

जब हुए मजबूर तो क़िस्मत को बुरा कहने लगे


खैर, इंसाँ का बस चले तो मुक़द्दर ख़रीद ले। मगर ये मुमकिन नहीं है। ज़िंदगी के कुछ क़िस्से इतने सच्चे हैं के कल्पना जैसे मालूम होते हैं। यही तो ख़ूबी है ज़िंदगी की। असली नक़ली और नक़ली असली मालूम देता है।


हम को भी क्या क्या मज़े की दास्तानें याद थीं

लेकिन अब तमहीदे-ज़िक्रे-दर्दों-मातम हो गईं


तक़रीबन दो सौ साल पहले लखनऊ में एक कल्लन साब हुआ करते थे। अंग्रेज़ थे और नाम था जॉन कॉलिंस। वो कल्लन की लाट में दफ़्न हैं और लाट कल्लन का इलाक़ा भी उसी नाम से मशहूर है। कल्लन का भूत भी बड़ा मशहूर था जो रात में वहाँ से गुज़रने वालों से कहता था, "अमको मक्कन रोटी मांगटा"।


मगर वो क़िस्सा फिर कभी।

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